Heart's Final Port 2
Heart's Final Port 2
पल्लवी अब अभय की ज़िंदगी में वापस लौट आई थी। उस रात जब पल्लवी ने अभय को मैसेज किया, तो अभय की खुशी का ठिकाना न रहा। बरसों का इंतज़ार जैसे एक पल में सिमट गया था। दोनों के बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ, और साथ ही रोमा भी ऑनलाइन आ गई। रोमा, जो इन दोनों के मिलन की गवाह थी, अब मज़ाक-मस्ती के मूड में थी।
अभय: "पल्लवी, एक बात पूछूँ? रोमा तो कह रही थी कि तुम मुझसे बात तक नहीं करना चाहती थी...
पल्लवी ने तुरंत रोमा से खिंचाई करते हुए पूछा, "मैंने ऐसा कब बोला?"
पल्लवी ने रोमा को अलग से मैसेज किया, "देख रोमा, जो हम बातें कर रहे हैं, वो अभय को मत बताना।" लेकिन रोमा कहाँ मानने वाली थी! वह साथ के साथ अभय को सब कुछ बताती जा रही थी। रोमा ने अभय को लिखा, "भाई, तेरी तो चाँदी हो गई, अब पार्टी तैयार रख!" अभय ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "ज़रूर, जो तुम कहो।"
बातों के दौरान पल्लवी ने पूछा, "क्या आप रोज़ इतनी देर से सोते हो?"
अभय ने मज़ाक में कहा, " 9 बजे ही सो जाता हूँ।"
पल्लवी हँसते हुए बोली, "फिर तो पक्का रोमा मुझे सुनाएगी कि मैंने उसके भाई की नींद खराब कर दी और उसे तंग कर रही हूँ।"
अभय का दिल तेज़ी से धड़क रहा था,
अभय :- "आज तो मुझे नींद ही नहीं आएगी।"
इसी तरह, पल्लवी और अभय की रोज़ बातें होने लगीं।
दशहरा का दिन था और अभय की छुट्टी थी।
उस दिन अभय ने सारा काम छोड़कर बस फोन हाथ में थाम रखा था। उसने पल्लवी को फोन किया और पूछा, "दशहरा देखने नहीं जाओगी क्या?"
पल्लवी ने कॉल पर थोड़ा उदास होकर कहा, "मम्मी अभी नानी के घर गई हुई हैं। जब वो वापस आएँगी, तभी मैं जा पाऊँगी।"
फिर क्या था, अभय की बेचैनी बढ़ गई। वह हर आधे-एक घंटे में पल्लवी को फोन लगा देता और बस एक ही सवाल पूछता— "मम्मी आ गईं क्या?" पल्लवी की आवाज़ सुनने का उसका यह बहाना इतना प्यारा था कि पल्लवी भी उसकी इस बेताबी को समझकर मुस्कुरा रही थी।
पल्लवी ने कॉल पर अभय से कहा, "ठीक 6 बजे दशहरे के मेले में मिलना।" बातों-बातों में उसने शरारत से पूछा, "मेरे लिए मेले से क्या लाओगे?" अभय ने कह दिया, "जो तुम कहोगी, वही लाऊँगा।" पल्लवी हँसते हुए बोली, "अरे, मैं तो बस मज़ाक कर रही हूँ।"
शाम हुई, अभय ने अपने दोस्तों को फोन किया। महेश और अनिल पहले ही मेले में पहुँच चुके थे। अभय अपने दोस्त रवि को उसके घर से लेने गया और दोनों साथ में मेले की तरफ निकल पड़े। मेले की भीड़ और शोर के बीच अभय का फोन रवि के पास था। पल्लवी बार-बार मैसेज कर रही थी, लेकिन रवि का ध्यान फोन पर नहीं था और अभय को पता ही नहीं चला।
जब अभय ने रवि से अपना फोन लिया, तो पल्लवी के ढेरों मैसेज देखकर उसके हाथ-पांव फूल गए। पल्लवी मेले के बाहर खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी। अभय को रवि पर बहुत गुस्सा आया कि उसने समय पर मैसेज क्यों नहीं दिखाए। आनन-फानन में अभय ने पल्लवी के लिए खूबसूरत झुमके (Earrings) खरीदे। पल्लवी ने पहले ही मैसेज में बता दिया था, "मेरे साथ छोटा भाई वंश है, तो तुम पास मत आना।"
झुमके खरीदने के चक्कर में अभय को थोड़ी देर हो गई। पल्लवी का मैसेज आया, "मैं अब घर जा रही हूँ।" अभय घबराया हुआ महेश के साथ वहाँ पहुँचा, तो देखा कि पल्लवी घर के लिए निकल रही थी। अभय अपनी बाइक पल्लवी की स्कूटी के पीछे-पीछे चलाने लगा। उसका पूरा ध्यान पल्लवी पर था। यह देखकर पीछे बैठे महेश ने कहा, "भाई, थोड़ा सामने भी देख ले, वरना रावण की जगह हम जल जाएँगे!"
अभय मुस्कुराते हुए आधे रास्ते तक पल्लवी के साथ-साथ चलता रहा, फिर उसने अपनी बाइक घुमा ली। दशहरे के बाद, सभी दोस्त एक दुकान पर बैठकर पार्टी कर रहे थे। अभय ने गर्व से सबको झुमके दिखाए और कहा, "देखो, तुम्हारी भाभी के लिए लिए हैं।"
अगले दिन, अभय ने वो झुमके रोमा को दे दिए ताकि वह पल्लवी तक पहुँचा सके। पल्लवी को वो झुमके बहुत पसंद आए। बातों-बातों में रोमा ने अभय को बताया, "पल्लवी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही है। अगर तुम्हारे पास पुरानी किताबें रखी हों, तो उसे दे देना।"
शाम को जब पल्लवी और अभय की चैटिंग शुरू हुई, तो पल्लवी का मूड कुछ उखड़ा हुआ था। उसने गुस्से में अभय से पूछा, "आपने मेरे लिए नई किताबें क्यों खरीदीं?"
अभय ने उदास मन से जवाब दिया, "क्या मैं तुम्हारे लिए इतना भी नहीं कर सकता?"
पल्लवी ने अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा, "अगर आपके पास पुरानी किताबें थीं, तो वही देनी चाहिए थीं। नई खरीदने की क्या ज़रूरत थी?"
पल्लवी मन ही मन सोचने लगी कि अभय की उससे उम्मीदें अब बहुत बढ़ गई हैं। और अपना भविष्य उसके साथ देख रहा है। लेकिन पल्लवी जानती थी कि उसकी फैमिली इस शादी के लिए कभी नहीं मानेगी।
अगली बार जब उनकी बात हुई, तो पल्लवी ने उसे सच्चाई का आईना दिखाने की कोशिश की। उसने साफ़ शब्दों में कहा, "अभय, मेरे घरवाले हमारी शादी के लिए कभी तैयार नहीं होंगे।"
अभय ने पूरी हिम्मत जुटाकर कहा, "मैं मना लूँगा तुम्हारी फैमिली को। तुम बस मेरा साथ देना।"
लेकिन अब जब भी उनकी बात होती, पल्लवी उसे यही समझाती कि उनका साथ शायद कुछ ही समय का है। वह बार-बार कहती, "हमें सच को स्वीकार करना चाहिए, मेरे घरवाले कभी नहीं मानेंगे।" पल्लवी की ये बातें अभय को अंदर तक तोड़ देती थीं।
दुखी होकर और हार मानकर अभय एक दिन बोला, "अगर तुम्हें लगता है कि हमारा कोई भविष्य नहीं है, तो फिर तुम मुझे ब्लॉक क्यों नहीं कर देती?"
कहने को तो अभय ने यह कह दिया, लेकिन अंदर से वह कभी नहीं चाहता था कि पल्लवी उसे ब्लॉक करे। वह तो बस उसके मुँह से यह सुनना चाहता था कि वह उसे कभी नहीं छोड़ेगी। पल्लवी ने भी उसे ब्लॉक नहीं किया
अब पल्लवी के जवाब छोटे होने लगे थे। जहाँ पहले घंटों बातें होती थीं, अब वहाँ सिर्फ 'हूँ', 'ठीक है' या कई घंटों के इंतज़ार के बाद एक छोटा सा रिप्लाई आता था। अभय के लिए यह 'धीरे-धीरे मरते हुए रिश्ते' को देखना बहुत मुश्किल था। उसे अनदेखा (ignore) किया जाना बर्दाश्त नहीं हो रहा था।
एक रात, हताशा में आकर अभय ने उसे मैसेज किया, "पल्लवी, अगर तुम्हें बात नहीं करनी तो मुझे ब्लॉक क्यों नहीं कर देती? कम से कम ये रोज़ का इंतज़ार तो खत्म होगा।"
उसने जवाब दिया:
"ठीक है, अगर तुम्हें यही चाहिए तो सुनो—आज के बाद मुझे न तो कॉल करना और न ही कोई मैसेज। मैं थक चुकी हूँ इन सब बातों से।"
अभय ने पल्लवी को सीधे परेशान करना बंद कर दिया, लेकिन वह रोमा से पूछने लगा, "वह कैसी है? क्या उसने खाना खाया?"
रोमा इस पूरी स्थिति को समझ रही थी। वह जानती थी कि पल्लवी भी दुखी है, लेकिन वह मजबूर है। अब एक नया सिलसिला शुरू हुआ। जब भी रोमा और पल्लवी साथ होतीं, रोमा बिना अभय के पूछे ही उसे अपडेट भेज देती:
"अभी हम कॉलेज के कैंटीन में हैं, वह थोड़ी उदास दिख रही है।"
"उसने आज वही झुमके पहने हैं जो तुमने दिए थे।"
"आज वह मुस्कुरा रही थी, शायद पुरानी कोई बात याद आ गई।"
अभय अपने फोन की स्क्रीन पर इन मैसेज को देखता और एक ठंडी साँस भरकर रह जाता। वह पल्लवी के पास होकर भी उससे कोसों दूर था। वह जानता था कि पल्लवी को पता है कि रोमा उसे सब बता रही है, फिर भी पल्लवी ने कभी रोमा को रोका नहीं।
वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता, और धीरे-धीरे अभय ने भी उस खामोशी के साथ जीना सीख लिया था। रोमा के ज़रिए आने वाले अपडेट्स अब कम होने लगे थे। एक दिन रोमा ने अभय को बताया कि पल्लवी ने सरकारी परीक्षा निकाल ली है और अब वह अपनी ट्रेनिंग के लिए दूसरे शहर जा रही है।
अभय के पास उसे बधाई देने का हक़ भी नहीं बचा था। उसे पल्लवी की वह बात याद आई— "हम सिर्फ थोड़े समय के लिए एक हो सकते हैं।" आज वह सच उसके सामने खड़ा था।
आखिरी मुलाकात
जाने से ठीक एक दिन पहले, अभय को पता चला कि पल्लवी बस स्टैंड पर होगी। वह दूर से उसे एक आखिरी बार देखने पहुँच गया। पल्लवी अपनी फैमिली के साथ खड़ी थी, उसके चेहरे पर एक नई चमक और कामयाबी का गर्व था। अभय ने उसे पास जाकर आवाज़ नहीं दी। वह जानता था कि अब आवाज़ देना पल्लवी की नई शुरुआत में बाधा डालना होगा।
तभी पल्लवी की नज़र अचानक उस भीड़ में खड़े अभय पर पड़ी। उसने न तो हाथ हिलाया, न ही मुस्कुराई। बस एक गहरी साँस ली और बस में चढ़ गई।
पल्लवी बस में चढ़ गई और बस धीरे-धीरे नज़रों से ओझल होने लगी। अभय वहीं खड़ा उसे जाते हुए देखता रहा। उसे महसूस हुआ कि यह सिर्फ एक लड़की का जाना नहीं था, बल्कि उसके जीवन के एक बड़े अध्याय का अंत था।
उसने एक लंबी साँस ली और अपने मन में कहा:
"शायद स्कूल वाले वो पल्लवी और अभय तो पहले ही मर चुके हैं... ये वो पल्लवी नहीं है और न ही मैं अब वो अभय हूँ। वक्त ने हमें बदल दिया है।"
वह समझ गया था कि जिस मासूमियत और निस्वार्थ प्रेम के साथ उन्होंने शुरुआत की थी, वह स्कूल के गलियारों और पुरानी यादों में ही कहीं छूट गया है। अब सामने खड़ी हकीकत अलग थी, और उस हकीकत में उन दोनों की मंज़िलें अलग हो चुकी थीं।
अभय अपनी बाइक पर वापस लौट आया। रास्ते में उसे वही जगह दिखी जहाँ वह कभी पल्लवी के लिए घंटों इंतज़ार करता था। आज वहाँ सन्नाटा था। अभय ने अपना फोन निकाला और पल्लवी का नंबर हमेशा के लिए डिलीट कर दिया।
उसने महसूस किया कि प्यार का मतलब हमेशा पा लेना नहीं होता; कभी-कभी प्यार का मतलब उसे आज़ाद कर देना भी होता है, ताकि वह अपनी दुनिया बसा सके।
"अंत में सब कुछ अच्छा हो जाता है, और अगर अच्छा न हो, तो वह अंत नहीं है।"
अभय के लिए यह 'अंत' अच्छा तो नहीं था, लेकिन यह उसे एक नया 'आरंभ' देने के लिए ज़रूरी था। उसने अपनी आँखों के आंसू पोंछे, बाइक स्टार्ट की और अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गया।
THE END
BY TEAM AB
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