एक ऐतिहासिक कार्टून का पुनर्पाठ।"
एक ऐतिहासिक कार्टून का पुनर्पाठ।"
आज हम एक ऐसे ऐतिहासिक कार्टून पर बात कर रहे हैं जिसने भारतीय संविधान के जनक, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर, और देश के पहले प्रधानमंत्री, पं. जवाहरलाल नेहरू, दोनों को एक ही फ्रेम में दिखाया। यह कार्टून दशकों तक व्यंग्य का हिस्सा रहा, लेकिन एक दिन यह राष्ट्रीय विवाद का केंद्र बन गया।
यह कार्टून भारतीय कार्टूनिस्ट शंकर पिल्लई (K. Shankar Pillai) ने 1950 के दशक की शुरुआत में बनाया था।यह कार्टून संविधान निर्माण की प्रक्रिया में होने वाली देरी और संविधान की विशालता/लंबाई पर एक हास्यपूर्ण टिप्पणी थी। सम्भावना है कि उस समय जातिगत भेदभाव (जातिवाद) के कारण और पंडित नेहरू को महान दिखाने के उद्देश्य से, चित्र (कार्टून) को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया हो।
यह कार्टून वर्ष 2006 में पहली बार NCERT की कक्षा 11वीं की राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक "Indian Constitution at Work" (भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार) में प्रकाशित हुआ था।
यह प्रकाशन नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005) के तहत किया गया था। हालांकि, इस पर बड़ा विवाद और विरोध 2012 में हुआ था, जिसके बाद इसे पाठ्यपुस्तक से हटाने का निर्णय लिया गया।
जनता भी इतनी मूर्ख बन जाती है कि वह यह नहीं समझ पाती कि देश उनके द्वारा चुकाए गए टैक्स के पैसों से चलता है, न कि किसी पार्टी के अपने पैसों से। अब पार्टी चाहे कोई भी हो—बीजेपी, कांग्रेस, या आम आदमी पार्टी—जनता का काम सरकार से सवाल करना होना चाहिए।
डॉलर का रेट 90 रुपये हो गया है, और कोई भी समझदार व्यक्ति यह समझ सकता है कि यह क्यों हुआ है। गरीबी सूचकांक (Poverty Index) देख लीजिए या बेरोजगारी दर (Unemployment Rate), सबका क्या हाल है। देश की इस हालत का सारा बोझ मध्य वर्ग (Middle Class) को उठाना पड़ता है। अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और गरीब।
कानून-व्यवस्था तो इतनी ध्वस्त हो गई है कि पूछो मत, जेलें सिर्फ गरीबों के लिए रह गई हैं। प्रदूषण का हाल भी आप देख सकते हैं। राहुल गांधी द्वारा वोट चोरी के इतने सबूत दिए जाने के बावजूद भी, बिके हुए न्यूज़ चैनल इन सब मुद्दों पर बात न करके—'दुनिया का सबसे पहला वैज्ञानिक रावण था'—जैसे बेतुके विषयों पर चर्चा करते हैं।
जो व्यक्ति देशहित की बात करेगा, उसके लिए क्या बीजेपी क्या कांग्रेस, वह सिर्फ वास्तविक मुद्दों पर बात करेगा। लेकिन अब तो हाल ऐसा है कि अगर कोई इन सब मुद्दों पर बात करता है, तो उसे सीधे 'कांग्रेस प्रेमी' करार दिया जाता है। और अगर आप किसी अंधभक्त को समझाने बैठेंगे, तो इसका मतलब सिर्फ भैंस के आगे बीन बजाना ही होगा।
कार्टून से जुड़ी मुख्य जानकारियाँ
| पहलू | विवरण |
| कार्टूनिस्ट | शंकर पिल्लई (K. Shankar Pillai) – भारतीय राजनीतिक कार्टूनिंग के जनक। |
| निर्माण वर्ष (अनुमानित) | 1950 के दशक की शुरुआत (लगभग 1950-1952)। |
| विषय-वस्तु | संविधान निर्माण की प्रक्रिया की धीमी गति (कछुए की चाल) पर व्यंग्य। |
| NCERT में प्रकाशन | वर्ष 2006 में कक्षा 11वीं की राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक 'Indian Constitution at Work' में शामिल किया गया। |
| प्रकाशन के समय केंद्र सरकार | संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA-I), प्रधानमंत्री: डॉ. मनमोहन सिंह। |
| विवाद का वर्ष | वर्ष 2012। |
| विरोध करने वाली प्रमुख पार्टियाँ | बसपा (BSP), आरपीआई (RPI) और मुख्य विपक्षी दल भाजपा (BJP) ने इसका समर्थन किया। |
| परिणाम | तत्कालीन MHRD मंत्री कपिल सिब्बल ने माफी मांगी और कार्टून को पाठ्यपुस्तक से हटाने की घोषणा की। |
एनसीईआरटी पुस्तक में कार्टून को शामिल करने की प्रक्रिया
कार्टून को पाठ्यपुस्तक में शामिल करने का निर्णय मुख्यतः निम्नलिखित तीन प्रमुख लोगों/समितियों से जुड़ा हुआ था:
1. पाठ्यपुस्तक विकास समिति (Textbook Development Committee)
एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों की सामग्री का मसौदा तैयार करने के लिए एक विशेष समिति बनाई जाती है। इस पुस्तक के लिए, सलाहकार समिति (Advisory Committee) और ** मसौदा समिति (Drafting Committee)** के सदस्य जिम्मेदार थे।
सलाहकार समिति के अध्यक्ष: इस समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर प्रताप भानु मेहता थे, जो उस समय सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) के अध्यक्ष थे और एक जाने-माने राजनीतिक विचारक थे।
मुख्य सलाहकार (Chief Advisor): पुस्तक के मुख्य सलाहकार डॉ. सुहास पलशिकर थे, जो उस समय पुणे विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में प्रोफेसर थे।
कार्टून के उपयोग का उद्देश्य: मुख्य सलाहकार डॉ. सुहास पलशिकर ने बाद में स्पष्ट किया था कि इस कार्टून को डॉ. अम्बेडकर का अपमान करने के इरादे से नहीं, बल्कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया की जटिलता को दर्शाने के लिए एक शिक्षण उपकरण के रूप में शामिल किया गया था। उनका उद्देश्य छात्रों को यह सिखाना था कि राजनीतिक कार्टून कैसे आलोचनात्मक विचार विकसित करने में मदद करते हैं।
2. तत्कालीन NCERT निदेशक
पाठ्यपुस्तक की सामग्री को अंतिम मंज़ूरी देने में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के तत्कालीन निदेशक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
तत्कालीन निदेशक (2006 में प्रकाशन के समय): प्रोफेसर कृष्ण कुमार थे।
इस समिति ने 2005-2006 के दौरान पाठ्यपुस्तक तैयार की थी, जो 2006 में नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005) के तहत प्रकाशित हुई थी।
विवाद के बाद का घटनाक्रम (2012)
जब 2012 में इस कार्टून पर बड़ा विवाद खड़ा हुआ, तो सरकार ने हस्तक्षेप किया।
तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री (MHRD): श्री कपिल सिब्बल (UPA सरकार)।
परिणाम: विवाद के बाद, कपिल सिब्बल ने संसद में घोषणा की कि पाठ्यपुस्तक से आपत्तिजनक कार्टून को हटा दिया जाएगा और इस विषय की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा।
2012 में कार्टून पर विवाद करने वाली प्रमुख पार्टियाँ
विवाद मुख्य रूप से तब उठा जब संसद (Parliament) में इस मुद्दे पर जोरदार हंगामा हुआ।इस मुद्दे को सर्वप्रथम संसद में उठाकर इसे राष्ट्रीय विवाद का विषय बनाने का श्रेय मुख्य रूप से बहुजन समाज पार्टी (BSP) को जाता है।
हालाँकि, व्यापक राजनीतिक विरोध शुरू होने से पहले, इस कार्टून पर सबसे पहली आपत्ति तमिलनाडु के कुछ राजनीतिक दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाई थी।
1. बहुजन समाज पार्टी (BSP)
भूमिका: बसपा इस विवाद की सबसे मुखर पार्टी थी। पार्टी अध्यक्ष मायावती और उनके सांसदों ने संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में इस कार्टून को डॉ. अम्बेडकर का घोर अपमान बताते हुए हंगामा किया।
आधार: बसपा ने तर्क दिया कि यह कार्टून दलितों के सबसे बड़े प्रतीक डॉ. अम्बेडकर को गलत तरीके से चित्रित करता है और यह जातिगत पूर्वाग्रह को दर्शाता है।
2. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI)
भूमिका: आरपीआई, जिसका दलित समुदाय में एक आधार है और जो सीधे तौर पर डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा से जुड़ी है, ने भी सड़क से संसद तक इस पर कड़ा विरोध जताया।
नेता: पार्टी के नेता रामदास आठवले ने इस विषय पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई।
3. भारतीय जनता पार्टी (BJP)
भूमिका: उस समय मुख्य विपक्षी दल के रूप में, भाजपा ने सरकार (UPA) को घेरने के लिए इस मुद्दे को उठाया।
आधार: भाजपा ने शिक्षा मंत्री (कपिल सिब्बल) से तत्काल माफी मांगने और कार्टून को हटाने की मांग का समर्थन किया, जिससे सरकार पर दबाव और बढ़ गया।
4. क्षेत्रीय दल (जैसे DMK और अन्य)
भूमिका: तमिलनाडु जैसे राज्यों से कुछ क्षेत्रीय दलों, विशेषकर जो सामाजिक न्याय के मुद्दों से जुड़े थे, ने भी इस कार्टून को आपत्तिजनक मानते हुए इसका विरोध किया।
अम्बेडकरवादी – क्या है अम्बेडकरवाद?
वास्तव में इस शब्द का कोई अर्थ नहीं है। अगर कोई व्यक्ति एकता, बन्धुत्व, और राष्ट्रीय-एकता की बात करता है, बाबा साहेब के विचारों का प्रचार करता है, तो अंधभक्तों द्वारा वह व्यक्ति 'अम्बेडकरवादी' करार दे दिया जाता है। और यदि आप वास्तव में 'भगवान' शब्द का अर्थ जानना चाहते हैं, तो आप बाबा साहेब की जीवनी पढ़ सकते हैं।
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