वजूद का इतिहास: बिग बैंग से आधुनिक मानव सभ्यता तक का सफर

ब्रह्मांड का सफर: शून्य से जीवन की पहली कोशिका तक (भाग 1)

क्या आपने कभी सोचा है कि आपके हाथ में जो लोहा है, या आपके शरीर में जो कार्बन है, वह कहाँ से आया? अगर मैं आपसे कहूँ कि आप और मैं, हम सब असल में टूटे हुए तारों के टुकड़े हैं, तो क्या आप यकीन करेंगे?

चलिए, आज समय के पहिए को पीछे घुमाते हैं और चलते हैं एक ऐसे रोमांचक सफर पर, जहाँ न कोई इंसान था, न धरती थी, और न ही कोई आसमान!

"शून्य से सृष्टि तक: आज से 13.8 अरब साल पहले हुआ वह महा-विस्फोट (The Big Bang), जिसने एक छोटे से बिंदु से हमारे इस विशाल ब्रह्मांड, समय और अंतरिक्ष (Space) को जन्म दिया।"


समय: आज से करीब 13.8 अरब साल पहले

चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ सन्नाटा था। एक ऐसा सन्नाटा जिसमें न कोई जगह (स्पेस) थी और न ही बीता हुआ या आने वाला समय। सब कुछ एक बेहद छोटे, अनंत गर्म और भारी पॉइंट में समाया हुआ था—इतना छोटा जो एक सुई की नोक पर भी फिट हो जाए।

फिर अचानक एक जोर का झटका लगा! कोई आग का गोला नहीं फटा, बल्कि वह छोटा सा पॉइंट अचानक से तेजी से फैलने (एक्सपैंड) लगा। इसे हम कहते हैं 'द बिग बैंग'

इस एक धमाके ने स्पेस और समय को जन्म दिया। शुरुआत के कुछ ही सेकेंड्स में इतनी गर्मी थी कि कोई चीज टिक नहीं सकती थी, लेकिन जैसे-जैसे ब्रह्मांड फैला, वह ठंडा होने लगा और जन्म हुआ दुनिया के सबसे पहले नन्हे कणों (पार्टिकल्स) का—जैसे प्रोटॉन्स और इलेक्ट्रॉन्स।

हमें कैसे पता? (सपूत/एविडेंस): साइंटिस्ट्स ने स्पेस में एक ऐसी गूंज (इको) ढूँढ निकाली है जो इस धमाके के वक्त पैदा हुई थी। इसे 'कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन' कहते हैं। साथ ही, हमारी दूर की गैलेक्सीज आज भी एक दूसरे से दूर भाग रही हैं, जो साबित करता है कि कभी न कभी सब कुछ एक ही जगह पर था।

बिग बैंग तो हो गया, लेकिन पूरे ब्रह्मांड में सिर्फ दो ही गैसें थीं—हाइड्रोजन और हीलियम। अब दिक्कत यह थी कि सिर्फ गैस से तो कोई जिंदा चीज नहीं बन सकती। जीवन के लिए चाहिए था कार्बन, ऑक्सीजन और आयरन (लोहा)। यह सब कहाँ से आता?

तब ग्रैविटी (गुरुत्वाकर्षण) ने अपना खेल शुरू किया। उसने हाइड्रोजन गैस के बादलों को आपस में इतना खींचा और दबाया कि वे गुस्से में लाल-गर्म हो गए। और इस तरह जन्म हुआ ब्रह्मांड के पहले तारों (स्टार्ट) का।

ये तारे आम तारे नहीं थे, ये एलिमेंट्स बनाने की बड़ी फैक्टरियाँ थे। इनके पेट के अंदर हाइड्रोजन आपस में जुड़-जुड़ कर नए-नए एलिमेंट्स बनाती रही। और जब ये बड़े तारे अपनी जिंदगी के आखिरी मोड़ पर एक खौफनाक धमाके (सुपरनोवा) के साथ फटे, तो इनके अंदर बने कार्बन, नाइट्रोजन और आयरन जैसे एलिमेंट्स पूरे अंतरिक्ष में फैल गए।

आपके खून में जो लोहा है ना, वह अरबों साल पहले किसी तारे के दिल में बना था। इसीलिए मशहूर साइंटिस्ट कार्ल सगन ने कहा था—"हम सब तारों के कचरे से बने हैं।"

समय: आज से करीब 4.5 अरब साल पहले

अंतरिक्ष में बिखरे हुए इन्हीं एलिमेंट्स, धूल और पत्थरों ने आपस में जुड़कर हमारे सूर्य और हमारी धरती को बनाया।

लेकिन अगर आप उस वक्त की धरती को देखते, तो डर के मारे भाग जाते। वह जीवन के लायक बिल्कुल नहीं थी। चारों तरफ उबलता हुआ लावा बह रहा था, आसमान से लगातार उल्कापिंड गिर रहे थे, और ज्वालामुखी (वोलकैनो) से जहरीली गैसें निकल रही थीं। यह बिल्कुल एक नर्क जैसी दिखती थी।

धीरे-धीरे धरती ठंडी हुई। ज्वालामुखियों से जो पानी की भाप (वाटर वेपर) निकली, उसने आसमान में घने बादल बनाए। फिर क्या था? धरती पर हजारों साल तक लगातार मूसलाधार बारिश होती रही! इस बेहिसाब बारिश ने उबलती हुई धरती को ठंडा किया और जन्म हुआ दुनिया के पहले समुद्रों (ओशन्स) का।

हमें कैसे पता? (सबूत/एविडेंस): ऑस्ट्रेलिया में साइंटिस्ट्स को 'जिरकॉन क्रिस्टल्स' (एक तरह का प्राचीन पत्थर) मिले हैं जो 4.4 अरब साल पुराने हैं। इनसे पता चलता है कि उस दौर में धरती ठंडी हो चुकी थी और पानी बनना शुरू हो गया था।

समुद्र तो बन गए, लेकिन उनके अंदर कोई मछली या पौधा नहीं था। वह सिर्फ केमिकल्स का एक गर्म घोल था, जिसे साइंस की भाषा में "प्राइमोर्डियल सूप" कहते हैं। इस सूप में कार्बन, हाइड्रोजन और फॉस्फोरस जैसे बेजान केमिकल्स पानी में आपस में टकरा रहे थे।

अब सबसे बड़ा सवाल यह था: एक बेजान केमिकल से एक जिंदा चीज कैसे बनेगी?

समुद्र की गहराइयों में जहाँ ज्वालामुखी की गर्मी थी, वहाँ ये केमिकल्स आपस में इस तरह जुड़े कि उन्होंने अमीनो एसिड्स और आरएनए (RNA) बना लिया। आरएनए समझ लीजिए जीवन का पहला "इंस्ट्रक्शन मैनुअल" या ब्लूप्रिंट था, जिसमें जीवन को आगे बढ़ाने का कोड लिखा था।

हमें कैसे पता? (सबूत/एविडेंस): 1952 में 'मिलर-उरे' नाम के साइंटिस्ट्स ने लैब में बिल्कुल पुरानी धरती जैसा माहौल बनाया—वही गैसें, वही गर्म पानी, और बिजली की जगह स्पार्क्स दिए। कुछ ही दिनों में उस बेजान पानी में अपने आप अमीनो एसिड्स बन गए! इससे साबित हुआ कि सही माहौल मिले तो केमिकल से जीवन की शुरुआत हो सकती है।

समय: आज से करीब 3.8 अरब साल पहले

और फिर वह जादुई पल आया जिसने पूरे इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। समुद्र के उस केमिकल सूप में, उन ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल्स (RNA) के चारों तरफ फैटी एसिड्स की एक प्रोटेक्टिव दीवार (मेंब्रेन) बन गई। एक ऐसी दीवार जो अंदर की दुनिया को बाहर की दुनिया से अलग करती थी।

इस तरह जन्म हुआ धरती के पहले जीवन का—एक सिंगल सेल (कोशिका)।

इसे साइंस में LUCA (लास्ट यूनिवर्सल कॉमन एन्सेस्टर) कहते हैं। यह सेल इतना छोटा था कि इसे नंगी आँखों से देखा भी नहीं जा सकता था। इसके पास न कोई दिमाग था, न दिल, और न ही ऑक्सीजन लेने के लिए फेफड़े। यह बस समुद्र के केमिकल्स को खाता, उससे ऊर्जा बनाता, और अपने आप को एक से दो में डिवाइड (कॉपी) कर लेता था।

लेकन याद रखिए, आज धरती पर जितने भी पेड़-पौधे, मछलियाँ, शेर, या हम और आप हैं... हम सब इसी एक छोटे से सेल के बच्चे हैं। यह हम सब का सबसे पहला दादा-दादी (पूर्वज) है।

हमें कैसे पता? (सबूत/एविडेंस): वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में पत्थर जैसे ढांचे मिले हैं जिसे 'स्ट्रोमैटोलाइट्स' कहते हैं। ये असल में 3.5 अरब साल पुराने सिंगल-सेल ऑर्गेनिज्म के फॉसिल्स (जीवाश्म) हैं, जो पक्का सबूत हैं कि उस दौर में जीवन सेल के रूप में शुरू हो चुका था।

अगले भाग में...

एक ऐसा दौर जहाँ न साँस लेने के लिए हवा में ऑक्सीजन थी, न ही ज़मीन पर कोई चलने वाला। लेकिन इस एक छोटे से सेल ने अब ठान ली थी पूरे ब्रह्मांड के इतिहास को पलटने की।

अगले भाग में हम देखेंगे कि कैसे इस छोटे से सेल ने धरती पर ऑक्सीजन बनाई, धरती को हरा-भरा किया और जीवन को समुद्र से निकाल कर ज़मीन पर लाया। जुड़े रहिए हमारे साथ!.............


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